एक मोड़ ज़िन्दगी का
बड़े दिनों बाद प्रीति और विनोद खुशी खुशी प्रीति के मायके जा रहे थे। मिठाइयां और फल रास्ते से ही ले लिए थे, घर नज़दीक ही था बस पैदल का सफर बाकी था। तभी अचानक आसमान में काली घटाएं छा गई, बादल गरज़ने लगे। दोनों ने अपने कदमों की रफ्तार तेज़ की।
प्रीति ने कहा-लगता है बारिश होगी तभी बारिश शुरू हो गई। और दोनों ने अपनी -अपनी शॉल से सिर को ढका और तेज़ी से भागने लगे। दरअसल सड़क पर चल रहे सभी लोग भागने लगे थे वैसे भी सर्दियों के मौसम में बारिश किसे पसंद है। इसी जल्दबाज़ी में वे दोनों दाएं की जगह बाएं मुड़ गए और पक्की सड़क की तरफ चले गए। तभी कुछ दूर चल कर। प्रीति ने टोका - अरे... यह तो गलत रास्ता है।
विनोद ने भी थाह ली और दोनों वापस मुड़ गए। रास्ते में उनका एक सहपाठी मित्र मनोज नज़र आया।
प्रीति-वह देखो मनोज जा रहा है , जाओ उससे मिल लो उसका हाल चाल ले लो ।
विनोद - तुम भी चलो।
प्रीति- मैं नहीं जाऊंगी तुम मिल आओ मैं यहीं इंतजार करूंगी।
विनोद मनोज के पास पहुंचा।
मनोज -अरे... विनोद तुम यहां कहां से...
विनोद- मैं तो बस यूं ही, यहीं से गुजर रहा था तो तुम्हें देखा और तुम बताओ तुम तो बड़े आदमी हो गए हो। दिखते नहीं हो आजकल।
मनोज-अरे ऐसी कोई बात नहीं है, तुम क्या कर रहे हो आजकल ?
विनोद- कुछ नहीं यार इतनी पढ़ाई करने के बाद भी बेरोजगार ही हूं ।
मनोज - क्यों भाई, कोई नौकरी कर लो या अपना ही काम शुरू कर लो।
विनोद - अरे यार, अपना काम शुरू करने के लिए पैसा चाहिए जो कि है नहीं और प्राइवेट नौकरी में कोल्हू के बैल की तरह काम करवाते हैं और तनख्वाह भी नाम मात्र की होती है।
मनोज- तुम पढ़े-लिखे आदमी हो सरकारी नौकरी की तैयारी क्यों नहीं करते?
विनोद - सरकारी नौकरी की तैयारी में ही लगे हैं पर वह भी अब मुश्किल ही लगता है। घर परिवार की जिम्मेदारियां हैं बाबूजी अब बूढ़े हो चले हैं। मां की भी तबीयत कुछ नासाज़ रहती है। सब कुछ मुझे ही देखना है।
(निम्न और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों की अंत में यही दशा होती है कि अकादमिक पढ़ाई काम नहीं आती और प्रोफेशनल कोर्स के पैसे नहीं होते डिग्री या डिप्लोमा खत्म होते -होते परिवार की जिम्मेदारीयां कंधों पर आ जाती है और कमाना मजबूरी बन जाता है। सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करना नामुमकिन सा हो जाता है, कई बार मुझे लगता है कि सरकारी नौकरी के फार्म भरना जुआ खेलने जैसा हो गया है बिल्कुल एक लॉटरी के टिकट खरीदने जैसा जहां पर सभी टिकट खरीदते हैं और नंबर मिलाते हैं किसी का एक नंबर से रह जाता है तो किसी की लॉटरी लग जाती है यहां पर नौकरी लगना लॉटरी लगने के बराबर ही है। और जिसकी नहीं लगी उसका समय और पैसा दोनों ही खराब होता है और जिसका लग गया उसको उम्र भर आराम हो जाता है खैर... यह मेरे अपने विचार हैं इसका कहानी से क्या लेना देना )
मनोज - अरे कहां दुनिया की मोह- माया में खोए हो मेरी मानो चलो आश्रम चलते हैं ।
विनोद- आश्रम...! कैसा आश्रम..?
मनोज- आओ मेरे साथ। यही पास में है बाबा हर हरदेव का आश्रम यहां आने वाले लोगों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं सारी चिंताओं से मुक्ति मिल जाती है चलो आज तुम्हें भी वही ले चलते हैं।
(जिस सड़क पर वह चल रहे थे उसी के दाएं तरफ एक बड़ा सा आश्रम था जिसमें लोग सफ़ेद वस्त्र पहनकर साधु भाव से जा रहे थे मनोज उसे उस आश्रम के भीतर ले गया।)
प्रीति भी उनको दूर से देख रही थी वह भी उनके पीछे-पीछे चली गई आश्रम के बाहर खड़ी होकर विनोद का इंतजार करने लगी। वहां उसने देखा कि कई लोग बाबा हर हरदेव के नाम की जय जय कार कर रहे हैं अर्थात् आपस में गुणगान कर रहे हैं कि यहां पर आकर उनके सभी कष्ट दूर हो गए अब उन्हें लगता है कि संसार में कोई मोह माया नहीं है। ऐसा लग रहा था कि वे सभी लोग अपनी ही मस्ती में खोए हुए हैं दुनिया में क्या हो रहा है ? क्या नहीं हो रहा है ? इससे उनका कोई लेना देना नहीं है। वे लोग केवल और केवल भक्ति रस में डूबे हुए हैं। और उन्हें लगता है कि उनकी यह भक्ति उन्हें वैरागी बना देगी।
प्रीति इस चिंतन में खो गई कि कुछ लोग संसार में कई सारी चीजों के पीछे भागते रहते हैं जैसे घर ,नौकरी ,पैसा, सरकार, न्याय - अन्याय आदि तरह-तरह की उलझनों में वे उलझे रहते हैं क्या सही है ? क्या गलत है ? यह सब सोचते रहते हैं और अपना समय ज़ाया करते हैं । मगर यहां इन लोगों को देखो, जैसे इन्हें समाज की कोई चिंता ही नहीं है। वे अपने जीवन का कोई मोल ही नहीं समझ रहे हैं।
कुछ ही देर में प्रीति का चिंतन टूटा और विनोद तथा मनोज साथ-साथ आश्रम से बाहर निकले उनको देखते ही प्रीति अचंभित रह गई, मनोज तो जिस दशा में भीतर गया था उसी दशा में था ,परंतु विनोद का पूरा कायाकल्प हो चुका था। अर्थात् वह पूर्ण रुप से भक्ति रस में डूबा हुआ नजर आ रहा था । वह मस्ती में झूम ,नाच और गा रहा था। ऐसा लग रहा था कि उसे अब अपनी सुध ही नहीं है। वह किसी और ही दुनिया का बाशिंदा था। साथ ही उसके कपड़े भी बदले हुए थे वह जब अंदर गया था तो उसने पैंट - कमीज़ पहन रखी थी। परंतु जब वह बाहर आया तब उसने सफेद रंग का चूड़ीदार पजामा ,कुर्ता और लाल रंग का चमकीला दुपट्टा ओढ़ रखा था। उसकी यह दशा देखते ही प्रीति आश्चर्यचकित भाव से कुछ भयभीत सी नज़र अयी । विनोद के हाथ में फूल मालाएं तथा प्रसाद के रूप में कुछ मिठाई और फल थे उनके बीच में एक छोटी सी प्लास्टिक की थैली में कुछ सफेद पाउडर जैसा था जिसे वह प्रसाद कह रहा था। विनोद ने वह थैली प्रीति की ओर बढ़ा दी, और प्रीति से कहा 'लो प्रसाद खाओ और बाबा के गुण गाओ।' उसके हाथ में यह पैकेट देखकर प्रीति को आभास हुआ कि संभवतः यह कोई नशीला पदार्थ हो सकता है। प्रीति एकदम घबरा सी गई । उसने देखा कि विनोद को अपनी सुध नहीं है। इसीलिए उसने उसके हाथ से सारा सामान ले लिया, वह पैकेट भी उसने लेकर अपने पर्स में ही रख लिया और कहा -
चलो अब घर चलते हैं। प्रसाद वहीं पर खाएंगे...
प्रीति ने किसी तरह विनोद को बहलाया और उसका हाथ पकड़ कर अपने घर की तरफ चलती चली गई। चलते - चलते उसके मन में अनेकों विचार घूम रहे थे। वह कुछ हद तक परेशान और अफसोस की भावना से जूझ भी रही थी। वह सोच रही थी कि मैंने आखिर विनोद को मनोज के पास जाने ही क्यों दिया। ये सब मेरी ही गलती का नतीजा है।
अब आगे क्या होगा, क्या विनोद ठीक हो पाएगा या नहीं। उसे लग रहा था कि अब उसका संसार, उसका परिवार सब खतरे में है। बेहतर ज़िंदगी का तो कुछ पता नहीं परंतु अब वह पहले जैसी जिंदगी भी जी पाएगी या नहीं...!
वह समझ नहीं पा रही थी कि अब उसे अच्छी नौकरी ,रुतबा, धन- दौलत ,अच्छा घर यह सब मिले या ना मिले पर उसका पहले जैसा ध्यान रखने वाला पति उसे फिर से वैसे ही मिल पाएगा या नही....!
(हमारे समाज में कितनी चकाचौंध है। हर व्यक्ति अपनी एक अलग दुनिया में मस्त है। कोई पैसों के पीछे भागता है तो कोई प्यार के पीछे ,कोई कला के पीछे ,तो कोई बुद्धि के पीछे भागता नज़र आता है। परंतु इन सभी का मूल तत्व शांति और सुख ही है यह कोई नहीं समझता की मन कि शांति में ही सुख है उपलब्धियां हासिल होने से जरूरी नहीं कि मन की शांति और सुख मिल सके।)

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