अपना देश दिवाली पर
यह वीडियो हमे भारत मे बने दिए खरीदने की प्रेरणा देता है। पर रात की खूबसूरती बढ़ाने के लिए यहाँ खुद अनगिनत चाइनीज़ लाइटों का प्रयोग किया गया है ।अब ये समझ नही आ रहा है कि इस दिवाली हम भावुक बने या प्रैक्टिकल.... हर साल जब दिवाली आती है तो, मिट्टी के दिये का प्रचार और चीनी लाइटों का बहिष्कार शुरू हो जाता है। क्या सिर्फ 1 दिन मिट्टी के बने दिए खरीद लेने से हमारे देश की गरीबी दूर हो सकती है?
अगर हम किसी को पीछे करना है तो हमे खुद को उससे बेहतर बनाना चाहिए, (किसी की बनाई लकीर को छोटा करने के लिए खुद उससे बड़ी लकीर बनानी चाहिए।)
और बहुत कुछ है हमारे देश मे जिनका प्रयोग हम अपने घरों को सजाने के लिए कर सकते है। जैसे हम भारतीय हस्तकला से बनी चीज़ो का प्रयोग कर सकते है। झूमर , चिड़िया, फूलदान आदि। इन हस्त कलाओं में हमारे देश के गरीब लोग काफी माहिर है। विदेशी वस्तुओं के लोभ में पड़कर हम अपने देश की काबिलियत को नज़र अंदाज़ किये जा रहे है। फिर हम पूछते है गरीबी कहाँ से आ रही है?
अब आती है तकनीक की बात आप खुद सोचिये की आज के समय मे उवभोक्ता को कैसी चीज़े भांति है ?सस्ता, सुंदर, सुरक्षित|दिया खरीदेंगे तो तेल, घी, रुई भी ख़रीदना पड़ेगा। उसे जब सजाएँगे तो आग न लगे इस बात का ख्याल भी रखना होगा । अब जितने दिए उतनी चिंता । इन सब झंझट से बचने के लिए व्यक्ति केवल पूजा के लिए ही दिए खरीदेगा और बाकी सजावट के लिए लाइट ही खरीदेगा ।
पर ये भी तो सोचिए जिस समय मे दीपक का निर्माण हुआ था उस समय रात को रोशनी करने का और कोई साधन ही नही था । और उस समय लोगो के घर काफी बड़े, खुले और मिट्टी से बने(अक्टूबर- नवंबर में ही कड़ाके की ठंड लगने लगती) हुआ करते थे तो लोगो ने दीपक जलाए ताकि रोशनी और गर्माहट दोनों मिल सके। परंतु आज के समय मे क्या ये तार्किक दृष्टि से सही है? आज हम मेट्रो सिटीज़ में रहते है। जहाँ लोगो के घर छोटे और पास-पास है, बहुमंजिला इमारते है, बिजली की तारे कितनी पास-पास है। ऐसी स्थिति में दीपक से घरों को साजना आग लगने का कारण हो सकता है।
अब ये सब कुछ जानते हुए हम कितने दीपक खरीद सकते है मुश्किल से 10 या 20 । ओर वही अगर भारत मे ही बनी लड़िया मिल जाये वो भी किफायती दामो पर तो ज़ाहिर सी बात है ज्यादा ही खरीदेँगे।
ऐसी स्थिति में सिर्फ अपना देश कह कर हम कितने लोगों को विदेषी समान खरीदने से रोक सकते है। तो क्या हमें अपने देश मे उपयोगी व बेहतर तकनीकों का इस्तेमाल नही करना चाहिए। जब भारत मे ही इन चमकीली लाइटों तथा अन्य उपकरणों का निर्माण होगा तो बेरोजगारी और गरीबी दोनों घटेंगे इससे खरीदने वाले पर भी कोई नैतिक दबाव नही रहेगा। और बेचने वाला भी अपनी दीवाली अच्छे से मना पायेगा । हम क्यों सोचते है कि मिट्टी के बर्तन (दीपक) बनाने वाला व्यक्ति आधुनिक काल मे भी मिट्टी के दीपक बना कर ही अपना पेट पालेगा। क्या वो उससे आगे नही बढ़ सकता । क्या वो नई तकनीकों को सीख कर अपना व्यापार बड़ा नही कर सकता है।..
अगर हम किसी को पीछे करना है तो हमे खुद को उससे बेहतर बनाना चाहिए, (किसी की बनाई लकीर को छोटा करने के लिए खुद उससे बड़ी लकीर बनानी चाहिए।)
और बहुत कुछ है हमारे देश मे जिनका प्रयोग हम अपने घरों को सजाने के लिए कर सकते है। जैसे हम भारतीय हस्तकला से बनी चीज़ो का प्रयोग कर सकते है। झूमर , चिड़िया, फूलदान आदि। इन हस्त कलाओं में हमारे देश के गरीब लोग काफी माहिर है। विदेशी वस्तुओं के लोभ में पड़कर हम अपने देश की काबिलियत को नज़र अंदाज़ किये जा रहे है। फिर हम पूछते है गरीबी कहाँ से आ रही है?
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